भारत में बजट आते ही एक अजीब-सी अपेक्षा पैदा हो जाती है। अगर उसमें मुफ्त राशन, फ्री बिजली, सब्सिडी या सीधे खाते में पैसा डालने की घोषणा नहीं होती, तो तुरंत यह राय बन जाती है कि “बजट फीका है” या “आम आदमी के लिए कुछ नहीं है।” यह धारणा धीरे-धीरे इतनी गहरी हो चुकी है कि अब बजट का मूल्यांकन (Union Budget 2026 ) उसकी दीर्घकालिक आर्थिक सोच से नहीं, बल्कि उसमें दी गई मुफ्त सुविधाओं की सूची से किया जाने लगा है।

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असल समस्या यह है कि भारत में “वेलफेयर” और “फ्रीबी” के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। जरूरतमंदों के लिए सहायता एक जिम्मेदार राज्य का कर्तव्य है, लेकिन जब हर वर्ग खुद को सब्सिडी का हकदार मानने लगे, तब यह आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आदत बन जाती है। आज स्थिति यह है कि अगर सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर या मैन्युफैक्चरिंग पर निवेश बढ़ाने की बात करे, लेकिन मुफ्त की घोषणा न करे, तो बजट (Union Budget 2026) को जनविरोधी करार दे दिया जाता है।

इस मानसिकता के पीछे दशकों की राजनीतिक संस्कृति है, जहां चुनावी लाभ के लिए लोकलुभावन घोषणाओं को विकास का विकल्प बना दिया गया। नतीजा यह हुआ कि बजट अब आर्थिक दस्तावेज़ कम और “घोषणा पत्र” ज़्यादा बनता जा रहा है। जनता भी अनजाने में इस खेल का हिस्सा बन गई है। सवाल यह नहीं पूछा जाता कि सरकार रोजगार कैसे बढ़ाएगी या अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत करेगी, बल्कि यह पूछा जाता है कि इस बार क्या-क्या मुफ्त मिलेगा।

मुफ्तखोरी की इस आदत का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह नागरिकों को अधिकार मांगने वाला नहीं, बल्कि लाभ पाने वाला बना देती है। जब राज्य से हर समस्या का समाधान बिना किसी योगदान के मिलने लगे, तो जिम्मेदारी और उत्पादकता दोनों कमजोर पड़ती हैं। यह सोच धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह निर्भरता को बढ़ावा देती है, जो किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।

बजट 2026 (Union Budget 2026 ) जैसे दस्तावेज़, जो दीर्घकालिक निवेश, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, मैन्युफैक्चरिंग, स्किलिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करते हैं, इसलिए कई बार “आम आदमी से कटे हुए” कहे जाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यही वे क्षेत्र हैं जो स्थायी रोजगार, आय और आर्थिक सुरक्षा पैदा करते हैं। मुफ्त योजनाएं तत्काल राहत देती हैं, लेकिन वे भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव नहीं बन सकतीं।

यह भी सच है कि भारत जैसे देश में सामाजिक सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सवाल मात्रा और मंशा का है। जब सब्सिडी जरूरत से ज़्यादा और सुधार कम हो जाएं, तो राजकोष पर बोझ बढ़ता है और विकास के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं। अंततः उसी आम आदमी को इसका खामियाजा महंगाई, कम रोजगार और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं के रूप में भुगतना पड़ता है।

आज जरूरत इस बात की है कि बजट को देखने का नजरिया बदला जाए। बजट को इस आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए कि “कितना फ्री मिला”, बल्कि इस आधार पर कि वह कितने लोगों को सक्षम बना रहा है। शिक्षा, स्किल, उद्योग और अवसर—ये सब मुफ्त नहीं होते, लेकिन यही सशक्तिकरण की असली पूंजी हैं।

जब तक भारत में बजट (Union Budget 2026 ) की सफलता का पैमाना मुफ्त घोषणाओं से तय होता रहेगा, तब तक दीर्घकालिक सुधार हमेशा अलोकप्रिय ही रहेंगे। सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या मुफ्त दे रही है, बल्कि यह है कि वह लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने के कितने अवसर दे रही है। शायद अब समय आ गया है कि “मुफ्त” से आगे बढ़कर “मजबूत भारत” की सोच को बजट की कसौटी बनाया जाए।

When will American overreach stop??

स्तंभकार: नितिन कुमार साहू (PRO, संस्थापक – द पब्लिको इंडिया)

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