भारत विविध सांस्कृतिक परंपराओं और उत्सवों का देश है, जहां हर क्षेत्र अपनी खास पहचान रखता है छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की होली भी अनोखी और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है। बस्तर का होलिका दहन 610 साल पुरानी राज परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा और उत्साह से मनाते हैं।

बस्तर की होली: एक ऐतिहासिक धरोहर बस्तर में होली सिर्फ रंगों का पर्व नहीं, बल्कि यह बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय परंपराओं का प्रतीक भी है। बस्तर की होली का संबंध यहां के पूर्व काकतीय राजवंश से जोड़ा जाता है। यह परंपरा 610 वर्षों से लगातार चली आ रही है और इसे राजपरिवार के संरक्षण में विशेष अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है।
राजपरिवार की भूमिका और परंपराएं बस्तर का होलिका दहन किसी साधारण जगह पर नहीं, बल्कि बस्तर राजमहल के विशेष प्रांगण में आयोजित होता है। होली के अवसर पर बस्तर के राजपरिवार के सदस्य आज भी परंपरागत रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।
राजपरिवार का मुखिया (वर्तमान में महाराज कमल चंद्र भंजदेव) स्वयं इस आयोजन में भाग लेते हैं और होलिका दहन की प्रक्रिया को विधिपूर्वक संपन्न कराते हैं।इस परंपरा के अंतर्गत माघ पूर्णिमा से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
बस्तर के विभिन्न गांवों से लकड़ियां एकत्रित की जाती हैं, और फिर राजपरिवार के निर्देशानुसार पवित्र स्थान पर होलिका स्थापित की जाती है। होलिका दहन के दिन राजमहल के सदस्यों के साथ-साथ क्षेत्र के प्रमुख लोग और ग्रामीण इस आयोजन में शामिल होते हैं।किसी अन्य क्षेत्र से अलग क्यों है यह परंपरा?
1. राजपरिवार द्वारा संरक्षित परंपरा जहां भारत के अन्य हिस्सों में होलिका दहन आम जनता द्वारा किया जाता है, वहीं बस्तर में यह राजपरिवार की देखरेख में विशेष रीति-रिवाजों के साथ संपन्न होता है।
2. मलंगियों की अनूठी भूमिका बस्तर की होली में ‘मलंगी’ नामक पारंपरिक समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये लोग होलिका दहन की प्रक्रिया को सही तरीके से संपन्न कराने में सहायता करते हैं और विशेष पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य व भजन-कीर्तन करते हैं।
3. आदिवासी संस्कृति का प्रभाव यहां की होली में आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। विभिन्न आदिवासी समुदाय गौरी-गौरा पूजा, पारंपरिक नृत्य, और संगीत के साथ इस त्योहार को मनाते हैं
4. सामाजिक एकता का प्रतीक बस्तर की होली राजपरिवार, आदिवासी समुदाय, और आम जनता के बीच एकता और सौहार्द्र का संदेश देती है। यह त्योहार जाति, धर्म और सामाजिक विभाजनों से परे जाकर सभी को एक सूत्र में बांधता है।बदलते समय में भी कायम है यह परंपरा बस्तर के लोग आधुनिकता के बावजूद अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोए हुए हैं।
610 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही भव्यता से मनाई जाती है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रमाण है।निष्कर्ष बस्तर का होलिका दहन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह बस्तर की गौरवशाली परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा भी है।
610 वर्षों से चल रही इस परंपरा में राजपरिवार की सहभागिता, मलंगियों की विशेष भूमिका और आदिवासी संस्कृति का समावेश इसे पूरे देश में अनूठा बनाता है। बदलते समय में भी इस परंपरा को जीवित रखने के लिए स्थानीय लोग और प्रशासन लगातार प्रयासरत हैं। यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक शक्ति और उसके गौरवशाली अतीत को दर्शाता है।