गोवर्धन पूजा के दो दिन बाद ही पूरे प्रदेश में झमाझम बारिश किसानों को रुला रही है। यह ऐसी आपदा है जिसमें भगवान से गुहार लगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। इंद्रदेव के प्रकोप से किसानों को बचाने की उम्मीद आज भी द्वापर जैसी ही है — जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर जन, पशु, फसल और प्रकृति के हर एक जीव-जंतु की रक्षा की थी। (Rainy Weather In Chhattisgarh)

रायपुर-बिलासपुर जैसे शहरों में यह बात शायद हल्की लगे, क्योंकि शहरों में बेमौसम बारिश का मतलब होता है चाय-पकोड़े और बालकनी में बैठकर मौसम का मज़ा लेना। लेकिन गांवों में इसका मतलब होता है महीनों की मेहनत पर पानी फिर जाना, खेतों में डूबी उम्मीदें और किसान के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें।

कार्तिक मास में छत्तीसगढ़ और पूरे भारत में लगभग 70% धान की कटाई होती है। इसी समय 100% सोयाबीन की फसल भी तैयार हो जाती है। यह किसानों के लिए चार महीनों की मेहनत का फल मिलने का महीना होता है, लेकिन बेमौसम बारिश जैसी आपदा उस सारी मेहनत पर पानी फेर देती है। (Rainy Weather In Chhattisgarh)

मानसून के लौट जाने के बाद एक बार फिर से लौट आई इस बारिश (Rainy Weather In Chhattisgarh) ने कच्चे रास्तों—जिन्हें छत्तीसगढ़ी में ‘धरसा’ कहा जाता है—को कीचड़ और जलभराव से भर दिया है। अब ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर और बैलगाड़ियाँ खेत तक नहीं पहुँच पा रही हैं। खेतों में पानी भर जाने से कटाई ठप हो गई है। पहले से कटे हुए धान खेतों में भीग रहे हैं, जिन्हें उठाना मुश्किल हो गया है। जमीन गीली है और धान की नमी से मिंजाई लगभग असंभव हो रही है। जिन घरों या कोठारों में फसलें सुरक्षित रखी थीं, वहाँ भी उन्हें बारिश से बचाना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। कुल मिलाकर यह भारी अनिश्चितता का समय है जिसमें किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं।

फसल बीमा या मुआवज़े का सवाल भी अनिश्चित है। किसे कितना मुआवज़ा मिलेगा, यह कई बार इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य या केंद्र में चुनाव निकट हैं या नहीं। सरकारी रिकॉर्ड गवाह है—कई किसानों को 100 रुपए, तो किसी को 500 रुपए का मुआवज़ा मिला। ऐसे में खेती-किसानी आज भी किस्मत आज़माने जैसा जोखिम भरा पेशा बना हुआ है। फिर भी, कर्ज़ के बोझ तले दबे किसान का हौसला और हिम्मत प्रेरणादायक है—महंगी मोटिवेशनल किताबों या सेमिनारों से कहीं ज़्यादा सशक्त प्रेरणा उस किसान की जद्दोजहद में है जो फसल बोने से लेकर काटने तक डटा रहता है।

यह भी सच है कि नुकसान केवल किसानों का नहीं होता। शहरों के व्यापारी, जिनकी दुकानदारी किसानों की खरीद पर निर्भर है, वे भी प्रभावित होते हैं। हार्वेस्टर मालिकों की मशीनें बंद पड़ी हैं, जिससे न केवल लाभ रुकता है बल्कि किस्तों का भुगतान भी कठिन हो जाता है। ट्रैक्टर, थ्रेशर, रीपर जैसे उपकरणों की गति थमने से पेट्रोल पंपों पर तेल की बिक्री घटती है। यह प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था तक पहुँचता है, और यही कारण है कि किसान को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है।

बेमौसम बारिश (Rainy Weather In Chhattisgarh) एक ऐसा संकट है जिसमें न तो किसान कुछ कर सकता है, न सरकार, न कोई व्यवस्था। कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें हमें अकेले झेलना पड़ता है। आज किसान उसी दौर से गुजर रहा है। फिर भी, कठिन वक्त में धैर्य रखना ज़रूरी है। मौसम खुलेगा, मिट्टी सूखेगी, फसलें कटेंगी और खुशहाली लौटेगी। मौसम की मार और किसानों की जद्दोजहद सदियों से चलती आ रही परंपरा है—और हर बार अंत में जीत उन्हीं धरती पुत्रों की हुई है जिन्होंने सच्चे मन से धरती की सेवा की है।

 

साभार: नितिन कुमार साहू (PRO, स्वतंत्र स्तंभकार)

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