छत्तीसगढ़ के विषय में एक कथन बहुत ही प्रसिद्ध है कि छत्तीसगढ़ में सरकार उसी पार्टी की बनती है जिसके सिर पर आदिवासी समाज का हाथ होता है। यह कथन पूरी तरह सत्य है और छत्तीसगढ़ की राजनीति को समझने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात से इंकार भी नही कर सकते। इसलिए तो बड़े-बड़े नेताओं के दौरे आदिवासी क्षेत्रों (chhattisgarh vidhansabha chunav 2023) में शुरू हो गए हैं। इस वर्ष 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस के दिन कांग्रेस ने तो प्रदेश के सभी जिलों में अपने मंत्री और बड़े आदिवासी नेताओं की ड्यूटी लगाकर गौरव दिवस के रूप में मनाया।

• पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा का आदिवासी क्षेत्रों से सूपड़ा साफ़ हो गया। जिसके चलते महज 15 सीटों पर सिमटना पड़ा। प्रदेश की कुल 29 आदिवासी आरक्षित सीटों में से 26 सीटों पर कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटा दिया और महज 03 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। राष्ट्रीय नेतृत्व भी सकते में आ गया कि इस चुनाव में उनसे ऐसी कौन सी गलती हो गई जो आदिवासी समाज ने उन्हें सिरे से नकार दिया।

चुनावी विश्लेषकों और गोंड समाज के सामाजिक नेताओं ने बातचीत में यह बताया कि भाजपा 32% जनजातीय समाज में गोंड समाज की निर्णायक भूमिका का आंकलन करने में विफल रही। जबकि कांग्रेस पार्टी ने आदिवासी समाज का ऊर्ध्व (Vertical) विश्लेषण भाजपा से कहीं बेहतर किया। भाजपा जो कि आदिवासियों का केवल क्षैतिज (horizontal) विश्लेषण करती रही 2013 के बाद से आदिवासी समाज का ऊर्ध्व सोशल इंजीनियरिंग करने में विफल (chhattisgarh vidhansabha chunav 2023) हो गई।

ऊर्ध्व और क्षैतिज सामाजिक इंजीनियरिंग में क्या अंतर है?

• आइए समझने की कोशिश करते है ऊर्ध्व और क्षैतिज सामाजिक इंजीनियरिंग में क्या अंतर है? क्षैतिज सामाजिक अभियांत्रिकी (horizontal social engineering) में किसी समुदाय के अंतर्गत मौजूद जनसंख्यिकीय विभिन्नता को ध्यान में नही रखा जाता। उदाहरण के तौर पर गांव में ग्वाले द्वारा चराए जा रहे गौवंशों के झुंड (छत्तीसगढ़ी में बरदी) को दूर से देखने पर हम गाय का झुंड ही कह देते है। यह उस झुंड या समूह का केवल क्षैतिज विश्लेषण हुआ अर्थात उपरी तौर पर मान लेना। ऊर्ध्व सामाजिक अभियांत्रिकी (vertical social engineering) में किसी समुदाय के अंतर्गत मौजूद जनसांख्यिकीय विभिन्नता का बारीकी से अध्ययन किया जाता है। जैसे ग्वाले द्वारा चराए जा रहे गोवंशो की झुंड में कितनी गाय है, कितने बछड़े है, कितने बैल है और कितने छोटे-छोटे गाय के बच्चे है। अर्थात उसका अध्ययन अंदर उतरकर करना, उसकी भिन्नताओं को समझना।

कुल अनुसूचित जनजाति में कितने प्रतिशत गोंड

• आइए अब इसे राजनीतिक सामाजिक परिपेक्ष्य से समझने का प्रयास करते है। 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में कुल जनजातियों की संख्या 78,22,902 है। जिसमे अकेले गोंड समूह के आदिवासियों की जनसंख्या 42,98,404 है जो कि कुल अजजा जनसंख्या का 55% है। गोंड समुदाय के बाद कंवर, उरांव, हल्बा, भतरा अजजा समुदाय बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ में निवासरत है लेकिन गोंड समुदाय निर्णायक रूप से छत्तीसगढ़ राजनीतिक उठापटक में भूमिका निभाता है।

कांग्रेस पार्टी ने दिया है पर्याप्त महत्व जबकि बीजेपी नहीं दे पायी

• आजादी के बाद से कांग्रेस छत्तीसगढ़ में इस सामाजिक समीकरण को समझते हुए शुरू से ही गोंड समाज के नेताओं को महत्व देते रही है। बस्तर क्षेत्र से स्व. रामप्रसाद पोटाई, स्व. मानकू राम सोढ़ी, अरविंद नेताम, स्व. महेंद्र कर्मा सरगुजा क्षेत्र से पुष्पादेवी सिंह, रामपुकार सिंह, प्रेमसाय टेकाम और मध्य क्षेत्र से स्व. भानुप्रताप सिंह, स्व. डॉ. भंवर सिंह पोर्ते, महेंद्र बहादुर सिंह जैसे धाकड़ नेताओं को पार्टी में पर्याप्त महत्व (chhattisgarh vidhansabha chunav 2023) दिया।

वे वादे जी भूपेश सरकार के लिए बन गए है सरदर्द

परंतु भाजपा शुरू से गोंड समाज को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है ऐसा परिलक्षित होता है। भाजपा बस्तर से स्व. बलीराम कश्यप (भतरा), सरगुजा से स्व. लरंग साय (कंवर), जशपुर से नंदकुमार साय और विष्णुदेव साय (दोनों कंवर), मध्य क्षेत्र से ननकी राम कंवर को नेतृत्व देती रही है। यहां पर यह भी जानना भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा में कभी उपेक्षित रहे गोंड समाज के दादा हीरासिंह मरकाम और सोहन पोटाई भाजपा छोड़ने के बाद समाज में जननेता के रूप में उभरे।
भारतीय जनता पार्टी ने 2003 से 08 के बीच के कार्यकाल में गोंड समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए प्रभावी प्रयास तो किए लेकिन 08-13 और 13-18 के मध्य अति आत्मविश्वास कहें यह केंद्र की मोदी सरकार आने के बाद अजेयता का गुमान जो भी कहें पर भाजपा ने छत्तीसगढ़ की गोंड आबादी को साधने के लिए कोई प्रयास नहीं किए।

यह आश्चर्य की बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने मध्य छत्तीसगढ़ में किसी भी गोंड नेता को न ज्यादा महत्व दिया और न कोई बड़ी जिम्मेदारी दी। बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग संभाग के 64 में से अधिकांश ग्रामीण सीटों में गोंड आबादी जीत में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। तीनों संभागों में गोडों की कुल जनसंख्या 19,090,84 है। लेकिन अफसोस कि इतनी बड़ी जनसंख्या के बाद भी भाजपा नेतृत्व आज तक इसका लाभ लेने के लिए किसी गोंड नेता को मध्य छत्तीसगढ़ ने उभार नहीं पाई और न ही अपना चेहरा बना पाई।

कांग्रेस और CM भूपेश का अचूक प्लान पड़ेगा बीजेपी पर भारी?

• भाजपा को इस भ्रम से निकलना होगा कि गोंड और आदिवासी वोट केवल बस्तर-सरगुजा के साथ-साथ केवल आरक्षित सीटों में ही महत्वपूर्ण है। बल्कि मध्य छत्तीसगढ़ के भारी भरकम सीटों पर ये जिनके पक्ष में होते है जीत उन्ही की होती है। आप चाहे कवर्धा की बात करें, खुज्जी विधानसभा की बात करे, खैरागढ़ की बात करें, चाहे बालोद, धमतरी या खरसिया, रायगढ़ या बिलासपुर की; इन सभी सीटों में आदिवासी गोंड समाज की भूमिका निर्णायक होती है। लेकिन उसे भुनाने के लिए मध्य छत्तीसगढ़ में भाजपा कोई बड़ा गोंड नेता पैदा नहीं कर पाई। और आज भी ये बस्तर-सरगुजा के नेताओं के भरोसे है।

• भाजपा ने 2003 से 08 तक गोंड समाज से 03 मंत्री मंत्रिमंडल में बनाए। 2008 से 13 तक 2 मंत्री और 2013 से 18 तक में एक भी मंत्री भाजपा ने गोंड समाज से नही बनाया और इसी के कारण विधानसभा चुनाव में आरक्षित सीटों में केवल 3 सीट ही भाजपा जीत पाई।

• आइए अब जानते है छत्तीसगढ़ के उन आदिवासी नेताओं के बारे में जिन्हे भाजपा में महत्व दिया जा रहा और उभारने की कोशिश की जा रही है। बस्तर में सुश्री लता उसेंडी को एकाएक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में नामित किया गया लेकिन पिछली 2 विधानसभा चुनावों 2013 और 2018 में कोंडागांव सीट से हार का सामना कर चुकी है। स्थानीय स्तर पर जनाधार भी कमजोर प्रतीत होता है। सदाफल देव जी के विहंगम योग से अत्यधिक जुड़ाव के चलते उनका सामाजिक स्तर पर भी स्वीकार्यता कम ही है। सरगुजा से सांसद श्रीमती रेणुका सिंह जो कि केंद्र में जनजातीय राज्यमंत्री हैं। परंतु केंद्र में मौका मिलने के बाद भी आदिवासी समाज में सक्रिय नहीं हो पाई हैं। सामाजिक गतिविधियों में रुचि नहीं लेने के कारण समाज में प्रभाव कम है। मध्य छत्तीसगढ़ (chhattisgarh vidhansabha chunav 2023) में इनकी सक्रियता बढ़ाने की महती आवश्यकता है।

• साथ ही साथ मध्य छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर संभाग में गोंड समाज के युवा और ऊर्जावान नेताओं को सक्रिय कर भाजपा में पर्याप्त महत्व देने की आवश्यकता है। अन्यथा भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में भी बहुमत से वंचित होना पड़ेगा. आसान शब्दों में कहें तो भाजपा को अपनी पिछली गलतियों से सीखना होगा.

http://sdf

भाजपा के तीन बड़े नेताओ को बनाया गया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

Share this -

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *